अम्बेडकर की पत्रकारिता
जब तक
मीडिया में हरेक तबके की यथोचित भागीदारी नहीं होगी, सूचना
का एकपक्षीय, आग्रहपूर्ण और असंतुलित
प्रसार जारी रहेगा। इस असंतुलित प्रसार के प्रतिरोध में ही आंबेडकर ने दलितों के
अपने खुद की मीडिया की जोरदार वकालत की थी। वे मानते थे कि अछूतों के साथ होनेवाले
अन्याय के खिलाफ दलित पत्रकारिता ही संघर्ष कर सकती है बाबा साहेब भीमराव
आंबेडकर का मानना था कि दलितों को जागरूक बनाने और उन्हें संगठित करने के लिए उनका
अपना स्वयं का मीडिया अति आवश्यक है। इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उन्होंने 31 जनवरी
1920 को
मराठी पाक्षिक ‘मूकनायक’ का प्रकाशन
प्रारंभ किया था। ‘मूकनायक’ यानी मूक लोगों का नायक। ‘मूकनायक’ के
प्रवेशांक की संपादकीय में आंबेडकर ने इसके प्रकाशन के औचित्य के बारे में लिखा था, “बहिष्कृत
लोगों पर हो रहे और भविष्य में होने वाले अन्याय के उपाय सोचकर उनकी भावी उन्नति व
उनके मार्ग के सच्चे स्वरूप की चर्चा करने के लिए वर्तमान पत्रों में जगह नहीं।
अधिसंख्य समाचार पत्र विशिष्ट जातियों के हित साधन करनेवाले हैं। कभी-कभी उनका
आलाप इतर जातियों को अहितकारक होता है।” इसी संपादकीय टिप्पणी में आंबेडकर लिखते हैं, “हिंदू
समाज एक मीनार है। एक-एक जाति इस मीनार का एक-एक तल है और एक से दूसरे तल में जाने
का कोई मार्ग नहीं। जो जिस तल में जन्म लेता है, उसी तल में
मरता है।” वे कहते हैं, “परस्पर
रोटी-बेटी का व्यवहार न होने के कारण प्रत्येक जाति इन घनिष्ठ संबंधों में स्वयंभू
जाति है। रोटी-बेटी व्यवहार के अभाव कायम रहने से परायापन स्पृश्यापृश्य भावना से इतना
ओत-प्रोत है कि यह जाति हिंदू समाज से बाहर है, ऐसा कहना
चाहिए।” आंबेडकर ने
इस संपादकीय टिप्पणी में 97 वर्ष पहले जो कहा था, वही आज का
भी कटु यथार्थ है। आंबेडकर के समय भी मीडिया में जातिगत पूर्वग्रह था और आज भी है।
मीडिया के ढांचे के जातिगत पूर्वग्रहों से प्रभावित होने तथा मीडिया संस्थानों में
उच्च पदों पर सवर्णों का कब्जा होने से कई बार दलितों के साथ होनेवाले अन्याय की
खबरों की अनदेखी होती है। यानी मीडिया उत्पादों पर सामाजिक पृष्ठभूमि का प्रभाव
सामग्री के चयन, प्रकाशन तथा
प्रसारण में देखा जाता है। जाहिर है कि जब तक मीडिया में हरेक तबके की यथोचित
भागीदारी नहीं होगी, सूचना का एकपक्षीय, आग्रहपूर्ण
और असंतुलित प्रसार जारी रहेगा। इस असंतुलित प्रसार के प्रतिरोध में ही आंबेडकर ने
दलितों के अपने खुद की मीडिया की जोरदार वकालत की थी। वे मानते थे कि अछूतों के
साथ होनेवाले अन्याय के खिलाफ दलित पत्रकारिता ही संघर्ष कर सकती है। स्वयं
आंबेडकर की पत्रकारिता कैसे इस सवाल पर मुखर थी, इसकी बानगी
उनकी लिखी ‘मूकनायक’ के 14 अगस्त
1920 के
अंक की संपादकीय में देखी जा सकती है, “कुत्ते-बिल्ली जो अछूतों का भी जूठा खाते हैं, वे बच्चों
का मल भी खाते हैं। उसके बाद वरिष्ठों-स्पृश्यों के घरों में जाते हैं तो उन्हें
छूत नहीं लगती। वे उनके बदन से लिपटते-चिपटते हैं। उनकी थाली तक में मुंह डालते
हैं तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होती। लेकिन यदि अछूत उनके घर काम से भी जाता है तो
वह पहले से बाहर दीवार से सटकर खड़ा हो जाता है। घर का मालिक दूर से देखते ही कहता
है-अरे-अरे दूर हो, यहां बच्चे की टट्टी डालने का खपड़ा रखा है, तू उसे
छूएगा?” कहना
न होगा कि विकल कर देनेवाली यह संपादकीय टिप्पणी जाति में बंटे भारतीय समाज को
आईना दिखाने में आज भी सक्षम है। केवल मीडिया ही नहीं, सभी
क्षेत्रों में दलितों की हिस्सेदारी सुनिश्चित किए जाने के प्रबल पक्षधर थे
आंबेडकर। 28 फरवरी
1920 को
प्रकाशित ‘मूकनायक’ के तीसरे
अंक में आंबेडकर ने ‘यह स्वराज्य नहीं, हमारे ऊपर राज्य है’ शीर्षक
संपादकीय में साफ-साफ कहा था कि स्वराज्य मिले तो उसमें अछूतों का भी हिस्सा हो।
स्वराज्य पर आंबेडकर का चिंतन लंबे समय तक चला। 27 मार्च 1920 को
प्रकाशित ‘मूकनायक’ के पांचवें
अंक की संपादकीय का शीर्षक हैः ‘स्वराज्य में हमारा आरोहण, उसका प्रमाण
और उसकी पद्धति।’ इसमें आंबेडकर ने मुख्यतः निम्न बिंदुओं को उठाया हैः
1. हिंदुस्तान का भावी राज्य एक सत्तात्मक या प्रजा सत्तात्मक न होकर प्रजा प्रतिनिधि सत्तात्मक राज्य होनेवाले हैं। इस प्रकार के राज्य को स्वराज्य होने के लिए मतदान का अधिकार विस्तृत करके जातिवार प्रतिनिधित्व देना जरूरी है।
1. हिंदुस्तान का भावी राज्य एक सत्तात्मक या प्रजा सत्तात्मक न होकर प्रजा प्रतिनिधि सत्तात्मक राज्य होनेवाले हैं। इस प्रकार के राज्य को स्वराज्य होने के लिए मतदान का अधिकार विस्तृत करके जातिवार प्रतिनिधित्व देना जरूरी है।
2.
हिंदू धर्म ने कुछ
जातियों को श्रेष्ठ और वरिष्ठ व कुछ को कनिष्ठ और अपवित्र ठहराया है। स्वाभिमान
शून्य नीचे की जातियों के लोग ऊपर की जातियों को पूज्य मानते हैं और शील शून्य ऊपर
की जाति के लोग नम्र भाव रखनेवाली इन जातियों को नीच मानते हैं।
3.
दलित उम्मीदवार को ऊंची
जाति का मतदाता नीच समझकर मत नहीं देगा और आश्चर्य की बात यह है कि ब्राह्मणेतर और
बहिष्कृत लोग बाह्मण सेवा का सुनहरा संयोग आया देख पुण्य संचय करने के लिए उनके
पैरों में गिरने को दौड़ पड़ेंगे।
4.
हरेक व्यक्ति को मतदान का
अधिकार मिलने पर चुनाव की पद्धति से, संख्या
के अनुपात से जातिवार प्रतिनिधित्व देना चाहिए।
5.
स्वराज्य मिलेगा, उससे प्राप्त होनेवाली
स्वयंसत्ता सब जातियों में कैसे विभाजित की जाएगी, जिसकी
वजह से स्वराज्य ब्राह्मण राज्य नहीं होना चाहिए, यह
प्रश्न मुख्य है।
मूकनायक’ की आरंभिक दर्जनभर संपादकीय टिप्पणियां आंबेडकर ने स्वयं लिखी थी। संपादकीय टिप्पणियों
मूकनायक’ की आरंभिक दर्जनभर संपादकीय टिप्पणियां आंबेडकर ने स्वयं लिखी थी। संपादकीय टिप्पणियों
को मिलाकर आंबेडकर के कुल 40 लेख ‘मूकनायक’ में छपे
जिनमें मुख्यतः जातिगत गैर बराबरी के
खिलाफ आवाज बुलंद की गई है। ‘मूकनायक’ के दूसरे
संपादक ध्रुवनाथ घोलप और आंबेडकर के बीच
विवाद होने के कारण उसका प्रकाशन अप्रैल 1923 में
बंद हो गया। उसके चार साल बाद 3 अप्रैल 1927
को आंबेडकर ने दूसरा मराठी पाक्षिक ‘बहिष्कृत
भारत’ निकाला। वह 1929 तक
निकलता रहा। बाबा
साहेब अछूतों की कमजोरियों को भी ठीक-ठीक पहचानते थे और उसकी
खुलकर आलोचना करते थे उनके
इस आलोचनात्मक विवेक की झलक हम ‘बहिष्कृत
भारत’ के दूसरे
अंक यानी 22 अप्रैल
1927 के
अंक में
प्रकाशित उनकी संपादकीय टिप्पणी में पा सकते हैं, “आचार-विचार
और आचरण में शुद्धि नहीं आएगी,
अछूत समाज में जागृति और प्रगति के बीज कभी नहीं उगेंगे। आज
की स्थिति पथरीली बंजर मनःस्थिति है।
इसमें कोई भी अंकुर नहीं फूटेगा इसलिए मन को
सुसंस्कृत करने के लिए पठन-पाठन व्यवसाय का अवलंबन
करना चाहिए।” आलोचनात्मक
विवेक के समांतर आंबेडकर ने दलितों के आरक्षण का सवाल जोर-शोर से
उठाया था ताकि
दलितों को ऊपर उठाया जा सके। 20 मई 1927 को प्रकाशित ‘बहिष्कृत भारत’ के चौथे
अंक की संपादकीय में बाबा साहेब ने जो लिखा उसके
मुताबिक़ पिछड़े वर्ग को आगे लाने के लिए सरकारी
नौकरियों में उसे प्रथम स्थान
मिलना चाहिए। यह विचार प्रगतिशील लोगों को अस्वीकार नहीं है परंतु यदि
धन के
स्वामी कुबेर पर अपनी संपत्ति सब लोगों में समान रूप से बांटने का प्रसंग आए तो
अंतिम पायदान
पर रहने वाले अति शूद्रों के अधिकार के सवाल पर कथित तौर पर
प्रगतिशील व्यक्ति भी आश्चर्य करेंगे।
3 जून 1927 को
निकले ‘बहिष्कृत
भारत’ के पांचवें
अंक में आंबेडकर ने आजकल के प्रश्न स्तंभ में एडिनवरो में भारतीय विद्यार्थियों के
साथ भेदभाव पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने लिखा था, “विलायत
में जानेवाले बहुत अमीरों के बच्चे होते हैं। वे खेलते-खेलते पढ़ाई करते हैं। उनके
प्रति अतिशय सहानुभूति रखने का कोई कारण नहीं। वर्णभेद पर जीनेवाले लोगों की
वर्णभेद के विरुद्ध शिकायत पर कौन खबर लेगा? इनमें स्वयं
इतना वर्णभेद घुसा है कि अछूतों को भारतीय स्पृश्यों की किसी भी व्यवस्था में
स्थान नहीं मिलता।” ‘बहिष्कृत भारत’ में आंबेडकर ने ‘महार और उनका वतन’ शीर्षक से चार किश्तों में संपादकीय लिखी। 23 दिसंबर
1927 के
अंक में ‘बहिष्कृत
भारत’ की संपादकीय
का शीर्षक हैः ‘अस्पृश्यों
की उन्नति का आधार।’ यानी मुख्यतया अस्पृश्यों की उन्नति के लिए ही बाबा साहेब
की पत्रकारिता संघर्षशील रही। ‘बहिष्कृत
भारत’ के बाद 1928 में
अंबेडकर ने समाज में समता लाने के उद्देश्य से ‘समता नामक ‘पाक्षिक
पत्र निकाला। बाद में उसका नाम ‘जनता’ कर दिया गया और अंततः 1954 में पाक्षिक
‘समता’ का नाम
बदलकर ‘प्रबुद्ध
भारत’ कर दिया
गया। ‘प्रबुद्ध
भारत’ आरंभ से
आखिर तक साप्ताहिक रहा। हर अंक में पत्रिका के शीर्ष की दूसरी पंक्ति में लिखा
होता था- डा. आंबेडकर द्वारा प्रस्थापित। साप्ताहिक शब्द के नीचे बुद्धं शरणं
गच्छामि, धम्मं शरणं
गच्छामि, संघं शरणं
गच्छामि छपा रहता था। ‘मूकनायक’, ‘बहिष्कृत भारत’, ‘समता’ और ‘प्रबुद्ध भारत’ में प्रकाशित आंबेडकर की तलस्पर्शी संपादकीय टिप्पणियां
भारत की समाज व्यवस्था से मुठभेड़ के रूप में देखी जानी चाहिए। आंबेडकर किसी विषय
पर तटस्थ पर्यवेक्षक की तरह नहीं लिखते थे, अपितु हर
बहस में हस्तक्षेप करते हुए यथास्थिति बदलने का प्रयास करते थे। आंबेडकर ने धर्म, जाति व वर्ण
व्यवस्था की विसंगतियों की जहाँ गहरी छानबीन की, वहीं उस
सामाजिक ढाँचे की परख भी की, जिसके अन्दर ये वर्ण व्यवस्था काम करती हैं। इस लिहाज से
जाति-वर्ण व्यवस्था पर आंबेडकर का मूल्यांकन सटीक है और इसीलिए विश्वसनीय दस्तावेज
भी। इस दस्तावेज का मूल्य तब और बढ़ जाता है, जब पूरे
परिदृश्य का जायजा व्यापकता और गहराई से लेते हुए सम्बन्धित सभी मुद्दों को उभारने
की कोशिश की गई हो। इसीलिए आंबेडकर का लेखन आज भी उतना ही प्रेरणास्पद व प्रासंगिक
है जितना उनके समय में था। आंबेडकर की पत्रकारिता हमें यही सिखाती है कि जाति, वर्ण, धर्म, संप्रदाय, क्षेत्र, लिंग, वर्ग आदि
शोषणकारी प्रवृत्तियों के प्रति समाज को आगाह कर उसे इन सारे पूर्वाग्रहों और
मनोग्रंथियों से मुक्त करने की कोशिश ईमानदारी से की जानी चाहिए। इसी के समांतर
मुख्यधारा के सभी पक्षों को दलित मुद्दों के प्रति संवेदनशील बनाने का प्रयास भी
किया जाना चाहिए। यह काम संप्रति जो पत्र-पत्रिकाएं कर रही हैं, उनमें उनमें
‘फारवर्ड
प्रेस’, ‘बुधन’, ‘सम्यक
भारत’, ‘दलित
दस्तक’, ‘आदिवासी
सत्ता’, ‘युद्धरत
आम आदमी’ और ‘मैत्री
टाइम्स’ जैसी
पत्रिकाएं प्रमुख हैं। हिंदी साहित्य में दलित साहित्य की अवधारणा को प्रारंभ करने
का श्रेय राजेंद्र यादव को जाता है।
जिस तरह हिंदी काव्यधारा में छायावाद की नींव
डालने का श्रेय ‘इन्दु’ (1909) और उसे लोकप्रिय बनाने का श्रेय ‘माधुरी’ (1921) को, नई कविता आंदोलन के विकास में बड़ी भूमिका निभाने का श्रेय 1954 में
प्रकाशित ‘नयी कविता’ (संपादकः जगदीश गुप्त, रामस्वरूप
चतुर्वेदी और विजयदेवनारायण साही) को जाता है, नई कहानी
आंदोलन को जन्म देने का श्रेय ‘कहानी’ और ‘नई कहानी’ पत्रिकाओं को और समानांतर कहानी को जन्म देने का श्रेय ‘सारिका’ को उसी तरह
अस्सी के दशक में दलित और स्त्री विमर्श को आंदोलन के रूप में चलाने और चर्चा के
केंद्र में लाने का श्रेय राजेंद्र यादव को जाता है। राजेंद्र यादव ने 1986 में ‘हंस’ का संपादन
शुरू किया और उसमें छपकर ही कई दलित लेखक प्रतिष्ठित हुए। उसके बाद साहित्य की
बहुजन अवधारणा को विस्तृत व व्यवस्थित रूप देनेवाली पत्रिका रहीः फारवर्ड प्रेस। नई
दिल्ली से 2009 में
‘फारवर्ड
प्रेस’ का प्रकाशन
प्रारंभ हुआ। फूले-आंबेडकरवाद की वैचारिकी पर आधारित यह द्विभाषी पत्रिका जून 2016 तक
निकलती रही। वह पत्रिका समाज के बहुजन तबकों में लोकप्रिय थी। पत्रिका का एक
महत्व पूर्ण अवदान यह भी माना जाता है कि इसने भारत की विभिन्नि भाषाओं के सामाजिक
न्यामय के पक्षधर बुद्धिजीवियों को एक सांझा मंच प्रदान किया। समाजविज्ञान व
राजनीतिक विज्ञान की दृष्टि से ‘ओबीसी विमर्श की सैद्धांतिकी’ तथा हिंदी
साहित्य में ‘बहुजन
साहित्य की अवधारणा’ विकसित करने में फारवर्ड प्रेस का विपुल योगदान माना जाता
है। इस पत्रिका के प्रधान संपादक आयवन कोस्का और संपादक प्रमोद रंजन हैं। ‘फारवर्ड
प्रेस’ की तरह ही ‘जस्टिस
न्यूज’ का इंटरनेट
संस्करण आरंभ किया गया है। दलित समुदाय के बुद्धिजीवियों, वरिष्ठ
पत्रकारों तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक समूह ने पीपुल्स मीडिया एडवोकेसी एंड
रिसर्च सेंटर का गठन कर जनवरी 2007 में ‘दलित मीडिया वाच’ का इंटरनेट संस्करण आरंभ किया था। अब उसे ‘जस्टिस न्यूज’ के नाम से
निकाला जाता है। उसकी बुलेटिन में पूरे भारत में दलितों के साथ होनेवाली ज्यादती
को प्रमुखता से कवर किया जाता है। कवरेज का स्रोत विभिन्न अखबार तथा पीपुल्स
मीडिया से संबद्ध प्रामाणिक जानकारियां होती हैं। यह बुलेटिन प्रतिदिन अंग्रेजी व
हिंदी में जारी होता है और देश-विदेश के लाखों लोग इसे रोज पढ़ते हैं। दलित
मीडिया वाच/ जस्टिस न्यूज के न्यूज अपडेट्स का बहुत असर लक्ष्य किया गया है। उनके
न्यूज अपडेट्स पर राष्ट्रीय अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग और मानवाधिकार आयोग समेत
विभिन्न राज्य सरकारें कार्रवाइयां भी करती रही हैं। कहने की जरूरत नहीं कि इन
बहुजन पत्रिकाओं ने समाज की अधोगति को युगधर्म मानने से इंकार करते हुए मानवीय
संवेदना को क्षत-विक्षत करने वाले औद्धत्य का प्रतिरोध कर अपने सजग दायित्व-बोध का
प्रमाण दिया है।
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